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कलेक्ट्रेट के सामने बुद्धा पार्क में 5 करोड़ के निर्माण पर उठे सवाल,

 कलेक्ट्रेट के सामने बुद्धा पार्क में 5 करोड़ के निर्माण पर उठे सवाल, 

🔴पारदर्शिता और गुणवत्ता पर घिरा प्रशासन

टाइम्स ऑफ़ कुशीनगर ब्यूरो

पडरौना, कुशीनगर।जिला मुख्यालय रवीन्द्रनगर स्थित कलेक्ट्रेट के ठीक सामने स्थित बुद्धा पार्क में लगभग पांच करोड़ रुपये की लागत से कराए जा रहे निर्माण कार्य को लेकर उठे सवालों ने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। गुणवत्ता, मानक और निगरानी व्यवस्था को लेकर मीडिया में सामने आए आरोपों के बाद औपचारिक स्तर पर नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण प्राप्त कर मामले को लगभग समाप्त मान लिया गया, लेकिन इस प्रक्रिया से असंतोष और शंकाएं कम होने के बजाय और गहराती दिखाई दे रही हैं।

मामले में जिलाधिकारी द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद कार्यदायी संस्था उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम (यूपीआरएनएस) के अधिशासी अभियंता ने लिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया, जिसमें निर्माण कार्य को निर्धारित मानकों के अनुरूप बताया गया है। हालांकि, विशेषज्ञों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि केवल विभागीय स्पष्टीकरण के आधार पर इतने बड़े सार्वजनिक निर्माण को ‘मानक के अनुरूप’ घोषित कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

बुद्धा पार्क का निर्माण स्थल प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है। यह कलेक्ट्रेट परिसर के सामने है तथा मुख्य विकास अधिकारी कार्यालय सहित अन्य महत्वपूर्ण विभागीय दफ्तरों से सटा हुआ है। ऐसे में करोड़ों रुपये की लागत से हो रहे निर्माण पर यदि गुणवत्ता संबंधी सवाल उठते हैं तो अपेक्षा की जाती है कि जांच प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और स्वतंत्र हो।

जानकारों का कहना है कि इस स्तर की परियोजना पर आरोप लगने की स्थिति में सामान्यतः स्वतंत्र तकनीकी एजेंसी से गुणवत्ता परीक्षण कराया जाना चाहिए, निर्माण सामग्री की लैब रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए, माप-पुस्तिका (एमबी) और भुगतान विवरण की समीक्षा होनी चाहिए तथा थर्ड-पार्टी ऑडिट भी कराया जाना चाहिए। अब तक ऐसी किसी स्वतंत्र जांच या ऑडिट की आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है।

अभियंता का तर्क है कि कार्य पूरी तरह मानक के अनुरूप है, लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि इन मानकों की पुष्टि किस स्वतंत्र संस्था द्वारा की गई। क्या निर्माण सामग्री के नमूनों की लैब रिपोर्ट सार्वजनिक की गई? क्या माप-पुस्तिका का बाहरी सत्यापन हुआ? यदि जांच का आधार वही विभाग है जिस पर आरोप लगे हैं, तो निष्पक्षता पर संदेह उठना स्वाभाविक है।

विधि विशेषज्ञों का कहना है कि सार्वजनिक धन से जुड़े मामलों में पारदर्शिता केवल दावा नहीं, बल्कि दस्तावेजी प्रमाण और स्वतंत्र सत्यापन से सिद्ध होती है। यदि गुणवत्ता और मानकों पर उठे गंभीर प्रश्नों के बाद भी स्वतंत्र जांच नहीं कराई जाती, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही के सिद्धांत के विपरीत माना जाएगा।

कलेक्ट्रेट की दहलीज के सामने हो रहा यह निर्माण अब केवल एक पार्क परियोजना नहीं रह गया है, बल्कि यह उस व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया है जो पारदर्शिता और सुशासन का दावा करती है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन महज स्पष्टीकरण के सहारे इस विवाद को विराम देता है या फिर निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के माध्यम से जनविश्वास बहाल करने की पहल करता है।

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