नवरात्र के छठे दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की होती है पूजा



भानु प्रताप तिवारी 


कुशीनगर। नवरात्र के छठे दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। कत नाम के एक प्रसिद्ध ऋषि के पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे जिनकी इच्छा थी कि मां भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म ले।

भगवती ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली थी। इसलिए इनका नाम कात्यायनी पड़ा। दूसरी कथा यह है कि जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बहुत बढ़ गया, तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सबसे पहले इनकी पूजा की।

इस कारण से भी यह कात्यायनी कहलायीं। कहा गया है कि आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्ल सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था। भगवान कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने कालिन्दी-यमुना के तट पर इन्हीं की पूजा की थी।

यह ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वाहन सिंह है। आठ भुजाएं हैं। वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्त को सहज भाव से मां कात्यायनी के दर्शन होते हैं। भक्तगण मां कात्यायनी की आराधना करते समय इस श्लोक को अवश्य पढ़ते हैं।


टाइम्स ऑफ़ कुशीनगर ब्यूरो 

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