कागजों में विकास, जमीन पर बदहाली! आखिर सरकारी सुविधाओं का ‘जाल’ जनता तक क्यों नहीं पहुंचता?

कागजों में विकास, जमीन पर बदहाली! आखिर सरकारी सुविधाओं का ‘जाल’ जनता तक क्यों नहीं पहुंचता?

योजनाओं के दावों और ग्रामीण हकीकत के बीच बढ़ती खाई, सवालों के घेरे में व्यवस्था और जवाबदेही

टाइम्स ऑफ कुशीनगर ब्यूरो

महराजगंज। सरकार समय-समय पर ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क, आवास, बिजली और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है। सरकारी फाइलों और रिपोर्टों में विकास की तस्वीर चमकदार दिखाई देती है, लेकिन जब इन्हीं दावों की हकीकत गांवों की चौपालों और गलियों में तलाशने की कोशिश की जाती है तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि योजनाएं तो बनती हैं, बजट भी स्वीकृत होता है और कई जगहों पर उद्घाटन भी किए जाते हैं, लेकिन सुविधाओं का पूरा लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाता। कहीं सड़क अधूरी है, कहीं नालियां जाम हैं, कहीं शुद्ध पेयजल का संकट है तो कहीं स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं। कई गांवों में बिजली, शिक्षा और रोजगार जैसी मूलभूत जरूरतें भी आज चुनौती बनी हुई हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि सरकार लगातार योजनाएं चला रही है तो आखिर इन योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचने से पहले कहां रुक जाता है? क्या जिम्मेदार विभागों की लापरवाही इसका कारण है या फिर निगरानी व्यवस्था कमजोर है? क्या स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तय नहीं हो पा रही है या योजनाओं का सही तरीके से क्रियान्वयन नहीं हो रहा? इन सवालों के जवाब आज भी आम जनता तलाश रही है।

ग्रामीणों का मानना है कि केवल घोषणाएं और सरकारी आंकड़े विकास का प्रमाण नहीं हो सकते। जब तक योजनाओं का लाभ गांव के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचेगा, तब तक विकास के दावे अधूरे ही माने जाएंगे। लोगों की मांग है कि सरकारी योजनाओं की नियमित समीक्षा की जाए, विकास कार्यों का सामाजिक अंकेक्षण कराया जाए और जहां भी लापरवाही या अनियमितता सामने आए, वहां जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि विकास की असली तस्वीर सरकारी कागजों में नहीं, बल्कि गांव की सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों, पेयजल व्यवस्था और आम लोगों के जीवन में दिखाई देनी चाहिए। यदि योजनाओं का उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुविधाएं पहुंचाना है तो प्रशासन को कागजी उपलब्धियों से आगे बढ़कर जमीनी हकीकत पर ध्यान देना होगा। तभी सरकारी योजनाओं पर जनता का भरोसा मजबूत होगा और विकास के दावे वास्तव में धरातल पर दिखाई देंगे।



रिपोर्टर: रणजीत मोदनवाल

टाइम्स ऑफ कुशीनगर

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