स्पेशल कोर्ट भेजी गई फाइल, कार्यालय पर लटका मिला ताला

स्पेशल कोर्ट भेजी गई फाइल, कार्यालय पर लटका मिला ताला

न्याय की उम्मीद में वकील-मुवक्किल लगाते रहे चक्कर, कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

जनपद न्यायाधीश की मंशा जल्द न्याय दिलाने की, लेकिन फाइलों के संचालन में लापरवाही से बढ़ रही परेशानी

टाइम्स ऑफ कुशीनगर ब्यूरो

गोरखपुर। जनपद न्यायालय गोरखपुर में वादियों को शीघ्र न्याय दिलाने के लिए मामलों को संबंधित विशेष न्यायालयों में भेजने की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन न्यायालयीन कार्यालयों में फाइलों के संचालन और उपलब्धता को लेकर सामने आ रही अव्यवस्था ने वकीलों और मुवक्किलों की परेशानी बढ़ा दी है। एसीजेएम तृतीय न्यायालय से एक मामले की फाइल विशेष न्यायालय में भेजे जाने के बाद वादी को उम्मीद थी कि अब उसके मामले की सुनवाई तेजी से आगे बढ़ेगी। लेकिन विशेष न्यायालय के कार्यालय में फाइल उपलब्ध न होने और कार्यालय पर ताला लगा होने से वादी और अधिवक्ता को इधर-उधर चक्कर लगाने पड़े।

बताया जा रहा है कि संबंधित मामले की फाइल एसीजेएम तृतीय न्यायालय से विशेष न्यायालय में भेजने का उद्देश्य वादी को जल्द न्याय दिलाना था। जनपद न्यायाधीश की ओर से भी मामलों के शीघ्र निस्तारण पर जोर दिया जा रहा है। इसी क्रम में विभिन्न मामलों की फाइलों को संबंधित विशेष न्यायालयों में भेजा जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि फाइल संबंधित न्यायालय के कार्यालय तक समय से नहीं पहुंचती है तो सुनवाई की प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ेगी।

मामला उस समय और गंभीर हो गया जब वादी और उसके अधिवक्ता विशेष न्यायालय के कार्यालय पहुंचे। उन्हें उम्मीद थी कि यदि फाइल अभी न्यायालय कक्ष में नहीं पहुंची है तो कार्यालय में मौजूद संबंधित कर्मचारी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर देंगे। आरोप है कि कार्यालय में ताला बंद मिला और कर्मचारी भी मौके पर मौजूद नहीं थे। इसके बाद अधिवक्ता और मुवक्किल काफी देर तक कार्यालय के आसपास चक्कर लगाते रहे।

वादी पक्ष का कहना है कि एक ओर न्यायालय स्तर से मामलों को विशेष न्यायालय में भेजकर शीघ्र न्याय दिलाने की पहल की जा रही है, वहीं दूसरी ओर कार्यालयीन स्तर पर फाइलों के पहुंचने और आवश्यक कार्रवाई में देरी होने से पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। मुवक्किल न्याय की उम्मीद में न्यायालय पहुंचता है और चाहता है कि उसकी फाइल संबंधित न्यायालय में समय से उपलब्ध हो, ताकि मामले की अगली कार्रवाई हो सके। फाइल उपलब्ध नहीं होने पर उसकी परेशानी बढ़ना स्वाभाविक है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि न्यायालय की फाइलों को संबंधित विशेष न्यायालय तक पहुंचाने की जिम्मेदारी किस स्तर पर है और इसकी निगरानी कौन करता है। यदि किसी फाइल को एक न्यायालय से दूसरे विशेष न्यायालय में भेजा जाता है तो उसका प्राप्त होना, दाखिला और संबंधित कार्यालय में उपलब्ध होना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। तभी वादी को यह भरोसा हो सकता है कि उसका मामला वास्तव में संबंधित न्यायालय तक पहुंच चुका है।

अधिवक्ता और वादी के बीच यह भी चर्चा रही कि यदि फाइल किसी कारणवश न्यायालय कक्ष में नहीं पहुंची थी तो कार्यालय में संबंधित कर्मचारी मौजूद रहकर आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर सकते थे। कार्यालय पर ताला लगा मिलने से वादी पक्ष परेशान हुआ और न्यायालयीन कार्यालयों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे।

वादी पक्ष का कहना है कि न्यायालय किसी व्यक्ति के लिए अंतिम उम्मीद होता है। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया में छोटी-सी प्रशासनिक या कार्यालयीन देरी भी मुकदमे से जुड़े व्यक्ति के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है। कई वादी दूर-दराज से तारीख और फाइल से संबंधित जानकारी के लिए न्यायालय पहुंचते हैं। यदि संबंधित कार्यालय में कर्मचारी नहीं मिलते या फाइल उपलब्ध नहीं होती तो उनका पूरा दिन प्रभावित होता है।

जनपद न्यायाधीश की मंशा और कार्यालयीन व्यवस्था में अंतर?

न्यायिक व्यवस्था का मूल उद्देश्य वादियों को समयबद्ध और निष्पक्ष न्याय उपलब्ध कराना है। मामलों को विशेष न्यायालयों में भेजना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इस व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए फाइलों की आवाजाही, दाखिला, रिकॉर्ड और संबंधित कार्यालय तक समय से पहुंचने की प्रक्रिया भी व्यवस्थित होना जरूरी है।

मामले में यह भी सवाल उठ रहा है कि विशेष न्यायालय के कार्यालय में ताला किस कारण से लगा था। यदि अवकाश या किसी अन्य कारण से कार्यालय बंद था तो क्या संबंधित फाइलों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था की गई थी? क्या अधिवक्ताओं और वादियों को यह जानकारी देने की कोई व्यवस्था थी कि फाइल कब तक उपलब्ध होगी? इन सवालों का जवाब मिलने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

वादी पक्ष की मांग है कि संबंधित फाइल को तत्काल विशेष न्यायालय में उपलब्ध कराया जाए और आगे से न्यायालयों के बीच स्थानांतरित होने वाली फाइलों की निगरानी व्यवस्थित ढंग से सुनिश्चित की जाए। साथ ही कार्यालय खुलने और कर्मचारियों की उपलब्धता की व्यवस्था भी स्पष्ट हो, ताकि न्याय पाने के लिए आने वाले वादियों और अधिवक्ताओं को अनावश्यक रूप से परेशान न होना पड़े।

न्यायालय प्रशासन की मंशा यदि वादियों को जल्द न्याय दिलाने की है तो उस मंशा को कार्यालयीन स्तर पर भी प्रभावी ढंग से लागू करना जरूरी है। फाइल संबंधित न्यायालय में उपलब्ध होने के बाद ही सुनवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। ऐसे में फाइलों के संचालन में किसी भी तरह की लापरवाही या अनावश्यक देरी को गंभीरता से लिया जाना आवश्यक है। अब देखना होगा कि संबंधित मामले की फाइल विशेष न्यायालय में कब तक उपलब्ध होती है और वादी को न्याय दिलाने की प्रक्रिया कितनी तेजी से आगे बढ़ती है।


रिपोर्टर: ब्यूरो

टाइम्स ऑफ कुशीनगर

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