करोड़ों खर्च, जंगल गायब: वृक्षारोपण के दावों पर घिरा वन विभाग

 करोड़ों खर्च, जंगल गायब: वृक्षारोपण के दावों पर घिरा वन विभाग

🔴 तीन साल के अभियान पर सवाल, जमीनी हकीकत से उलट आंकड़े

टाइम्स ऑफ़ कुशीनगर ब्यूरो 

कुशीनगर। जनपद में बीते तीन वर्षों से चल रहे वृक्षारोपण अभियानों के दावे अब सवालों के घेरे में हैं। हर वर्ष लाखों पौधे लगाने और करोड़ों रुपये खर्च करने के सरकारी दावों के बावजूद धरातल पर हरियाली का असर नगण्य नजर आ रहा है। जिन स्थानों को हरित पट्टी के रूप में दर्शाया गया, वहां सूखी जमीन, खाली गड्ढे और बेतरतीब झाड़ियां ही दिखाई दे रही हैं।

सूत्रों के मुताबिक, वृक्षारोपण का अभियान कागजों और प्रचार तक सीमित होकर रह गया है। कई स्थानों पर यह तक स्पष्ट नहीं है कि पौधारोपण वास्तव में हुआ भी था या नहीं। दावों और वास्तविक स्थिति के बीच बढ़ता अंतर अब प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

सबसे बड़ा सवाल लगाए गए पौधों की जीवित रहने की दर को लेकर है। विभाग के पास इस संबंध में कोई स्पष्ट और सार्वजनिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद परिणाम सामने न आना पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिह्न लगा रहा है।

🔴 आयोजन तक सीमित रह गया अभियान

वृक्षारोपण कार्यक्रमों में गड्ढे खोदने, पौधे लगाने और प्रचार-प्रसार तक ही गतिविधियां सीमित रहने के आरोप लग रहे हैं। इसके बाद पौधों की देखभाल, सिंचाई और सुरक्षा की अनदेखी की जाती है, जिससे कुछ ही समय में पौधे सूख जाते हैं।

🔴 जवाबदेही तय नहीं, कार्रवाई नदारद

लगातार खामियां सामने आने के बावजूद अब तक किसी भी स्तर पर जिम्मेदारी तय नहीं की गई है। न ही किसी अधिकारी के खिलाफ ठोस कार्रवाई हुई है और न ही व्यापक जांच की पहल दिखाई दे रही है, जिससे पूरे तंत्र की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।

🔴 अतिक्रमण से सिकुड़ता हरित क्षेत्र

जिन जमीनों को हरित बनाने का दावा किया गया था, वहां अब अतिक्रमण और निर्माण कार्य देखे जा रहे हैं। शिकायतों के बावजूद कार्रवाई का अभाव स्थिति को और गंभीर बना रहा है।

ऐसे हालात में यह मुद्दा केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर भी बड़ा सवाल बनकर उभर रहा है।

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