प्रतिज्ञा ने लिख दी साहस की नई इबारत, फतह किया एवरेस्ट बेस कैंप

 एवरेस्ट बेस कैंप पर तिरंगा: प्रतिज्ञा मिश्रा बनीं हौसले, बदलाव और प्रेरणा की मिसाल

टाईम्स ऑफ कुशीनगर ब्यूरो

कुशीनगर। देवरिया की बेटी और कुशीनगर के बेलवा गांव की बहू प्रतिज्ञा मिश्रा की एवरेस्ट बेस कैंप फतह अब केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि भर नहीं रह गई है, बल्कि यह कहानी पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा, आत्मविश्वास और बदलती सोच का प्रतीक बन चुकी है।


5364 मीटर की ऊंचाई पर तिरंगा लहराने का यह क्षण सिर्फ एक लक्ष्य की प्राप्ति नहीं, बल्कि उन तमाम सीमाओं को तोड़ने का संदेश है, जिन्हें अक्सर छोटे शहरों और गांवों के सपनों के आगे खड़ा कर दिया जाता है। सिंगापुर में आईटी प्रोफेशनल के रूप में कार्यरत प्रतिज्ञा ने यह साबित कर दिया कि सपनों की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती।

यह सफर आसान नहीं था। -16 डिग्री की कंपकंपाती ठंड, घटती ऑक्सीजन, और हर कदम पर जोखिम—इन सबके बीच प्रतिज्ञा का आत्मविश्वास ही उनका सबसे बड़ा सहारा बना। लगातार कई दिनों तक कठिन ट्रेकिंग और शारीरिक-मानसिक चुनौतियों का सामना करते हुए उन्होंने यह मुकाम हासिल किया।

लेकिन इस कहानी की असली ताकत सिर्फ एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंचना नहीं, बल्कि वह सोच है जो यह उपलब्धि पीछे छोड़ती है। प्रतिज्ञा ने यह दिखाया है कि आज की नारी केवल सपने देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें साकार करने का साहस भी रखती है।

सफलता के साथ सामाजिक सरोकार
प्रतिज्ञा की पहचान केवल एक सफल प्रोफेशनल या ट्रेकर के रूप में नहीं है। वह समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी उतनी ही गंभीरता से निभा रही हैं। अपने पति के साथ ‘दुर्गा फाउंडेशन’ के माध्यम से हजारों ग्रामीण बच्चों को डिजिटल शिक्षा से जोड़ना उनके विजन को और व्यापक बनाता है।

एक कहानी, जो सोच बदल रही है
देवरिया की गलियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंची प्रतिज्ञा की यह यात्रा आज युवाओं, खासकर बेटियों के लिए एक नई उम्मीद बन गई है। यह कहानी बताती है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, अगर इरादे मजबूत हों तो हर ऊंचाई को छुआ जा सकता है।

आज बेलवा गांव से लेकर देवरिया और कुशीनगर तक जश्न का माहौल है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा यह एक नई सोच का उत्सव है जहां सपनों को पंख मिलते हैं और हौसले उन्हें उड़ान देते हैं।

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