🔴 लोकायुक्त ने बाहर के अफसरों को सौंपी डीआईओएस के खिलाफ जांच
🔴 डीआईओएस पर आरोपों की बाढ, फर्जी नौकरी, बिना कार्य किये लाखों का एरियर, अवैध तरीके से अर्जित अकूत संपत्ति और परीक्षा केन्द्रों का खेल जांच के घेरे में
टाइम्स ऑफ कुशीनगर ब्यूरो
कुशीनगर। जिला विद्यालय निरीक्षक श्रवण कुमार गुप्त के खिलाफ चल रही लोकायुक्त जांच अब और भी गंभीर मोड़ पर पहुंच गई है। जिन आरोपों को अब तक “मैनेज” कर दबा देने की चर्चाएं चल रही थीं, शिकायतकर्ता की सक्रियता ने उन कोशिशों पर बड़ा झटका दे दिया है। शिकायतकर्ता द्वारा लोकायुक्त के समक्ष समय रहते आपत्ति दर्ज कराए जाने के बाद अब मामले में सीधे मण्डलायुक्त स्तर से हस्तक्षेप शुरू हो गया है।जानकारी के मुताबिक, लोकायुक्त कार्यालय से पूर्व में जारी पत्र संख्या 68-2026/06 दिनांक 8 अप्रैल 2026 में जिलाधिकारी कुशीनगर की अध्यक्षता में त्रिसदस्यीय जांच समिति गठित कर जांच कराने का निर्देश दिया गया था। समिति में एक वित्त एवं लेखाधिकारी तथा एक शिक्षा विभाग के अधिकारी को शामिल करने की बात कही गई थी।
निर्देश के अनुपालन में जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर ने एसडीएम पडरौना की अध्यक्षता में जांच टीम गठित की, जिसमें ट्रेजरी अधिकारी और बीएसए को शामिल किया गया। लेकिन शिकायतकर्ता विरेन्द्र सिंह ने इस जांच समिति की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए। उनका आरोप था कि स्थानीय स्तर पर जांच होने से पूरे मामले की लीपापोती और “मैनेज” की आशंका बनी रहेगी।बताया जाता है कि शिकायतकर्ता द्वारा लोकायुक्त को दस्तावेज, सीडी और अन्य अभिलेख उपलब्ध कराए गए, जिन्हें गंभीरता से लेते हुए सचिव लोकायुक्त उत्तर प्रदेश डॉ. रीमा बंसल ने मण्डलायुक्त गोरखपुर को नया निर्देश जारी किया। पत्र संख्या 68-2026/08/4673(2) दिनांक 12 मई 2026 में स्पष्ट कहा गया कि कुशीनगर से बाहर के वरिष्ठ अधिकारियों की तीन सदस्यीय समिति गठित कर निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा 3 जून 2026 तक रिपोर्ट लोकायुक्त कार्यालय को उपलब्ध कराई जाए।
लोकायुक्त ने यह भी निर्देश दिया है कि शिकायतकर्ता को अपना पक्ष रखने और साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दिया जाए। यानी इस बार जांच सिर्फ औपचारिकता तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि दस्तावेजों और तथ्यों की गहराई से पड़ताल होगी।
इस आदेश के बाद शिक्षा विभाग में हलचल तेज हो गई है। प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि अब मामला सामान्य विभागीय जांच से कहीं आगे निकल चुका है।
🔴 डीआईओएस पर लग रहे आरोप
जिला विद्यालय निरीक्षक श्रवण कुमार गुप्त पहले से ही कई गंभीर आरोपों से घिरे हुए हैं। आरोपों में फर्जी नियुक्तियों को संरक्षण देने, बिना कार्य किए लाखों रुपये एरियर भुगतान कराने, नियम विरुद्ध विनियमितीकरण और चयन वेतनमान का लाभ दिलाने, मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायतों की कथित लीपापोती करने तथा पद का दुरुपयोग कर अकूत संपत्ति अर्जित करने जैसे मामले शामिल हैं।
कप्तानगंज स्थित कनोडिया इंटरमीडिएट कॉलेज का मामला इस पूरे विवाद का सबसे चर्चित केंद्र बन चुका है। आरोप है कि सहायक अध्यापक देवेन्द्र पाण्डेय, श्याम नरायण पाण्डेय और विरेन्द्र पाण्डेय को दो वर्षों तक बिना कार्य किए लाखों रुपये एरियर के रूप में भुगतान कराया गया।
इसके अलावा देवेन्द्र पाण्डेय पर कथित रूप से तथ्य छिपाकर फर्जी तरीके से सहायक अध्यापक के पद पर नौकरी करने का आरोप भी है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि डीआईओएस ने कार्रवाई करने के बजाय मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर वित्त एवं महालेखाकार के अधूरे आदेश का हवाला देकर मामले को “निस्तारित” दिखाने की कोशिश की।
🔴 परीक्षा केन्द्र आवंटन को बनाया ‘कमाई का जरिया’
लोकायुक्त में दर्ज शिकायत में बोर्ड परीक्षा केंद्र निर्धारण प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि डीआईओएस श्रवण कुमार गुप्त ने परीक्षा केंद्र आवंटन को कथित तौर पर कमाई का जरिया बना दिया।शिकायत के अनुसार, माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा परीक्षा केंद्रों की संख्या घटाए जाने के बावजूद जिले में “री-ओपन” प्रक्रिया के माध्यम से नियमों के विपरीत कई विद्यालयों को परीक्षा केंद्र बना दिया गया। आरोप है कि इसके बदले मोटी रकम वसूली गई।
इतना ही नहीं, जिन विद्यालयों में पर्याप्त कक्ष, सीसीटीवी व्यवस्था, सुरक्षा मानक और बोर्ड द्वारा निर्धारित आवश्यक संसाधन तक उपलब्ध नहीं थे, उन्हें भी कथित रूप से पैसे के बल पर परीक्षा केंद्र का दर्जा दे दिया गया। इससे बोर्ड परीक्षाओं की निष्पक्षता और पूरे केंद्र निर्धारण सिस्टम की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
🔴 3 जून पर टिकी निगाहें
लोकायुक्त द्वारा मण्डलस्तरीय जांच के आदेश के बाद अब पूरा मामला बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। विभागीय सूत्रों के अनुसार सबसे ज्यादा चिंता इस बात को लेकर है कि यदि जांच टीम ने सेवा पुस्तिकाओं, एरियर भुगतान, नियुक्तियों, परीक्षा केंद्र निर्धारण और वित्तीय अनुमोदनों से जुड़ी फाइलों की गहराई से जांच की, तो कई और नाम सामने आ सकते हैं।
फिलहाल शिक्षा विभाग में भले ही आधिकारिक खामोशी हो, लेकिन अंदरखाने में बेचैनी साफ महसूस की जा रही है। अब सबकी निगाह 3 जून 2026 पर टिकी है, जब जांच रिपोर्ट लोकायुक्त के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी।
क्योंकि इस बार सवाल सिर्फ एक अधिकारी का नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता का है। और यदि आरोपों की परतें सच साबित हुईं, तो इसे शिक्षा व्यवस्था के नाम पर खेला गया संगठित भ्रष्टाचार माना जा सकता है।
रिर्पोट: अजय त्रिपाठी
टाइम्स ऑफ कुशीनगर


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